Sunday, 12 April 2020

प्रलय का अंत हमारे हाथों / कवि- डॉ. प्रशान्त दास

कविता 





विस्मित, चिंतित, आतंकित
हमारे अंतरतम का गान ।

एकाकी गलियां और जनपथ
अंदर से ताले लगे मकान।

हुआ क्या ऐसा इस धरती पर
बिन अनुमान, बिन संज्ञान ?

सामाजिकता कंप्यूटर तक
व्हाट्स-ऐप्प तक अनुसंधान ।

राजनीति की ज्वाला भड़की
जलता घर पर है इंसान ।

धर्म- पंथ के ईंधन पर अब 
पके न नफरत के पकवान ।

दिहाड़ी मजदूरों को भी
आत्मीयता से मिले सामान ।

भारतीयता रहे यह स्मित
बनें रहे हम सब इंसान ।

प्रलय का अंत हमारे हाथों
होगा ही निश्चित श्रीमान ।

एकमात्र संकल्प है साधन
थोड़ी भक्ति, थोड़ा ज्ञान ।
......


कवि - डॉ. प्रशान्त दास  
पता -लौजान (स्विट्ज़रलैंड)
कवि का ईमेल - prashant.pkd@gmail.com
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Wednesday, 8 April 2020

लोंकडाउन / रचनाकार - वंदना श्रीवास्तव

लघुकथा 


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आज लोंकडाउन का छठा दिन है। कन्सट्रक्शन साइट पर ही बनी झोपड़ी के कोने में रमिया आतंकित, आशंकित अपनी 6 वर्ष की बेटी रानी और 2वर्ष के बेटे के साथ अपने भाग्य पर आंसू बहा रही थी। पति पिछले वर्ष ही इसी साइट पर एक दुर्घटना में मारा गया था। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें। शुरू के 3-4 दिन जैसे तैसे पास रखे पैसों से बच्चों की भूख को सम्भाल लिया था लेकिन अब स्थिति हाथ से बाहर निकल गई थी। साइट पर रहने वाले अधिकतर लोग पैदल ही अपने गृह नगर की ओर चल पड़े थे। क्या करते...एक तरफ भूख तो दूसरी तरफ कोरोना...। रमिया दो नन्हें बच्चों के साथ ऐसा साहस तो नहीं जुटा पाई, लेकिन अब इस भयानक परिस्थिति से कैसे निपटें, समझ नहीं आ रहा था। बेटी रानी तो मां का उदास,दुखी और बेबस चेहरा देख सहम कर रोते रोते थक कर सो गई थी। नन्हा राजू अब भी भूख से बिलबिला रहा था। रमिया का कलेजा मुंह को आ रहा था। सुना है सरकार कुछ मदद भेजने वाली है। पेट की आग को दबा कर राजू को गोद में लिए झोपड़ी से बाहर निकल कर इधर उधर आशा की नजर दौड़ाई, पर निराशा ही हाथ आई। दूर दूर तक आदमी न आदमज़ात..बस एक कुत्ता मुंह में रोटी दबाए पीछे की गली से भागकर आता दिखाई दिया। रमिया निराश होकर अंदर मुड़ी ही थी कि राजू की दिल दहला देने वाली चीख सुनाई दी...रमिया बिजली की गति से वापस दरवाजे की ओर भागी। कुत्ता ज्यादा दूर नहीं गया था, रमिया तेजी से कुत्ते पर झपटी, उसके मुंह में दबी रोटी अब रमिया के साथ में थी। लपक कर अंदर भागी, कटोरी में पानी में नमक मिला कर उसमें रोटी भिगो कर राजू को खिलाने लगी।
..........

लघुकथाकार - वंदना श्रीवास्तव 
पता - नवी मुंबई 
कवि का ईमेल - vandanapradeep05@gmail.com
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Tuesday, 7 April 2020

लड़ना उससे है ज़रूर / कवि - राम उचित पासवान

कविता

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डरना कोरोना से नहीं पर लड़ना उससे है ज़रूर 
मार डालेंगे उसे तरकीब से अपनी ज़रूर

भारी मसला है बना यह देश, दुनिया के लिए 
है मगर चंद रोज़ा मसला सुलझा लेंगे हम ज़रूर 

शर्तिया इलाज इसका लॉकडाउन है सिर्फ एक 
दूर-दूर रहना हमें है गैरों से कुछ दिन ज़रूर 

चीन कोरिया  है मिसाल जिसने हराया कोरोना को 
लॉकडाउन से ही दे  दी मात उसको है ज़रूर 

बंद कर ले घर मे अपने को हम कुछ दिन के लिए 
दूर होंगी खुद बलाएं जल्द ही हम से ज़रूर 

 रख नज़र आस पास अपने आ न पाए अजनबी 
मुमकिन है वो हो पॉजिटिव कोरोना वायरस से ज़रूर 

सिर्फ पी.एम, सी. एम ही सब कुछ तो कर सकते नहीं 
जिम्मेदारी हर बशर को भी  निभाना है ज़रूर

हैरां और परीशां की हाजत है नहीं पासवा कोई 
मुक्त होंगे हम यक़ीनन ही कोरोना से ज़रूर .
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कवि - राम उचित पासवान
पता - मुजफ्फरपुर
कवि का ईमेल - sanjeev22000@gmail.com (के माध्यम से)
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Friday, 3 April 2020

जिंदगी कैसे बचेगी यह सोचों यारों ( स्टे एट होम) / अमीर हमज़ा

कविता 
      
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जहर खुद ही घोला है संसार में
अब तुम सुकूँ ढूंढते हो बाजार में

ये  तुम्हारे  ही  कर्मों  का  फल है
ये तुम्हारा ही आज और  कल  है

गर सभी रहेंगे अपने अपने घर में
सच में  शांति आ जाएगी शहर में

दोस्ती यारी तुम बाद में निभा लेना
हुनर का जलवा बाद में दिखा देना

जिंदगी कैसे कटेगी मत सोचों यारों
जिंदगी कैसे बचेगी यह सोचों यारों

बस  कुछ  ही  दिनों  की  बात  है
फिर  सुबह  सुहानी  हसीं  रात  है

नहीं मानोगे जीना दुश्वार हो जाएगा
प्यारा सा जीवन बेकार हो जाएगा
.........
कवि - अमीर हमज़ा
कवि का ईमेल - nirnay121@gmail.com
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Thursday, 2 April 2020

अपने को घर में बंद करें / कवि - वेद प्रकाश तिवारी

कविता 

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एक दूसरे की आलोचना
सारे मतभेद खत्म करें
आओ अपने को घर में बंद करें

अब किसको क्या मिला, नहीं मिला
यह समय नहीं शिकायत का
इस संकट की घड़ी में अपने
मन को रजामंद करें
आओ अपने को घर में बंद करें

बनाकर निश्चित दूरी सबसे
इक्कीस दिन बिताना है
होकर संकल्पित भारत से
कोरोना को भगाना है

इस कठिन परीक्षा में मिलकर
एक दूजे को उत्तीर्ण करें
आओ अपने को घर में बंद करें

जिन्हें नहीं फिकर कोरोना की
करते हैं उल्लंघन नियमों की
कहना है उनसे ,बस भी करो
मर रही मानवता अब तो चेतो

मानव जाति की रक्षा हेतु
बस यही एक संकल्प करें
आओ अपने को घर में बंद.
,,,,,,

कवि - श्वेवेद प्रकाश तिवारी
कवि का ईमेल - vedprakasht13@gmail.com
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इस कोरोना समय में

कविता

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समय यह
जरा कठिन सा है
अधिकतर चेहरों पर
उदासी की
लकीरें खीचीं हैं
चलता -फिरता जीवन
ठहर सा गया है

खुले हाथ
बंद मुठ्ठियों में
बदल गये हैं
धड़कते दिल और
कसमसाते पैर
घर में बंद पड़े हैं
जो जहां है
बस वहीं पर
ज़म सा गया है

सैकड़ों मील दूर से
उठ कर आया है
यह कोरोना का तूफान
जिसके ज़द में
फंसे हैं
क्या आम और
क्या खास

उपाय तो
ढ़ूढें नहीं मिल रहा
फिर सामने से लड़ कर
कैसे जीती जा सकती जंग
बचाव ही है
एक मात्र समाधान
बस सब छिप कर बैठें
जब शत्रु हो बलवान

बीत जायेगा यह समय भी
खुल जायेंगे रास्ते
तब तक
सुरक्षा के सब प्रहरी
जो अपनी नींद तोड़
अपना चैन छोड़
हमारा जीवन सुरक्षित बना रहे
करें हम
उनके ज़ज्बे को सलाम

इस कोरोना के समय में
छोड़ दे हम रोना
भरे स्वयं में आत्मविश्वास
इंसान और इंसानियत पर
करें हम सब भरोसा
सावधानी बरतें
और सावधान रहें
मन में रखें विश्वास
जीतेगे हम
हारेगा कोरोना
जरुर.....!
........

 कवयित्री - श्वेता शेखर
कवयित्री का ईमेल - shweta1429@gmail.com
प्र्तिक्रिया हेतु ब्लॉग के ईमेल - editorbejodindia@gmail.com

Wednesday, 1 April 2020

मनु कहिन(22) - जिंदगी ना मिलेगी दोबारा!

ललित निबंध

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अब ऐसा मैंने लिख दिया है तो  ज्यादा नकारात्मक सोचने की जरूरत नही है। वाकई मे, मैंने ऐसा कुछ नही लिखा है जिसपर, हाय तौबा मचाने की जरूरत है! जिंदगी हमेशा से ही बड़ी ही अनमोल रही है। भगवान की सबसे खूबसूरत देन मे से एक है। ऐसा कहा जाता है कि चौरासी लाख योनियों मे भटकने के बाद पुनः मानव जीवन की प्राप्ति होती है। मानव जीवन  **** बड़ी मुश्किल से प्राप्त होता है। फिर क्यूं इसे यूं ही छोड़ दिया जाए। क्यों इसे आधे अधूरे मे ही छोड़ दिया जाए। क्यूं नही जिंदगी को भरपूर जिया जाए।

वर्तमान मे हम सभी देख रहे हैं। अनुभव कर रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं *को रोना* संकट की। पुरा विश्व एक अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। 

*कोरोना* *वायरस*  रूपी संकट के बादल सबके ऊपर मंडरा रहे हैं। कुछ कम या ज्यादा सभी इसके चपेट मे हैं। पुरी की पुरी मानव जाति संकट मे है। यह वक्त ज्यादा सोचने का नही है। अपने आप को, अपने करीबियों को , अपने परिवार को बचाने का वक्त है। आप कैसे बच और अपनों को बचा सकते हैं। बस इतना ही सोचना है। सामाजिक दूरी बनाएं, कम से कम लोगों से मिले जुलें ! घरों मे ही रहें। सुरक्षित रहें। इसी तरह से ही आप इस *को रोना* रुपी भयानक आपदा से खुद को और अपने करीबियों को बचा सकते हैं। 

आज देश आपसे कुछ नही बस इस समस्या से निपटने के लिए महज़ २१ दिन मांग रहा है। क्या अपने देश के लिए आप २१ दिन नही दे सकते हैं ? अरे, २१ दिन क्या पुरी की पुरी जिंदगी न्योछावर है देश हित मे ! *राष्ट्रवाद* की पुकार है - सिर्फ और सिर्फ २१ दिन।

जिस प्रकार हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार "जिंदगी ना मिलेगी दोबारा" इसके भी दो पहलू हैं। इस २१ दिनों के लाॅक डाऊन को इंज्वॉय करें। बाध्यता की वजह से ही सही पुरी दुनिया छुट्टियां मना रही है ( मुझे क्षमा करें इस वक्तव्य के लिए) । सुरक्षा के दृष्टिकोण से घर के अंदर एक तरह से नजरबंद है हम सभी। यह मौका फिर नही मिलने वाला। भगवान न करे यह नौबत फिर से आए। पर, अगर नौबत आ ही गई है तो फिर परेशान न हों। छोटा सा कालै बादल का टुकड़ा है। हवा इसे जल्द ही बहा कर ले जाएगी। आपके देखते ही देखते यह मंज़र भी टल जाएगा ।

इसे आप अघोषित अवकाश कहें या फिर नजरबंदी*** एक ही रास्ता है। हंस कर परिवार के साथ इंज्वॉय करें। घर बैठकर पछिया हवा इंज्वॉय करें। इसका भी आनंद उठाएं। प्रदूषण मुक्त --- हां कतिपय कारणों से प्रदूषण मुक्त आवो-हवा इंज्वॉय करें। एक अभूतपूर्व शांत माहौल को इंज्वॉय करें। बच्चों के साथ, परिवार के अन्य सदस्यों के साथ गुणवत्तापूर्ण जीवन जिएं। अभी तक जिन्हें शिकायत थी एक दूसरे से *** समय की वजह से*** शायद दूर हो सकेगी। सोशल मीडिया पर हम देख भी रहे हैं। भिन्न-भिन्न तरीके से लोग इस वक्त को टालने मे लगे हैं। कोई किचन मे है तो कोई बर्तन और कपड़े साफ करता हुआ दिखाई दे रहा है।  पेशानी पर बल न दें। वक्त है ,  थोड़ा ही तो बुरा है ,टल ही जाएगा। यह किसी के लिए और किसी के चाहने से रूका है भला। बस, इस वक्त को अपने सर के उपर चढ़ने न दें। थोड़ा झटकते हुए इंज्वॉय करें।यही समय की मांग है।
हां, एक और positive पहलू जो इस संकट की घडी में दिखाई  दे रहा है वो यह कि   आस पड़ोस के स्थानीय दुकानदारों ने जरूरी सामानों की आपूर्ति बनाई रखने मे कोई कोर कसर नही छोड़ी।  सरकार ने भी यथासंभव आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति कुछ नियंत्रण के साथ निर्बाध जारी रखा।

 जो सामाजिक संबंध हमारी ताकत थी , इस सामाजिक दूरी के वक्त फिर से मजबूती के साथ हमारे साथ खड़ी दिखाई दी।

हर बड़ी घटना के गुजर जाने के बाद समीक्षाओं का एक दौर शुरू होता है। इस *को रोना* संकट की भी समीक्षा होगी। कहां से और कैसे इसकी शुरुआत हुई। कैसे इसे विस्तार मिला। कहां और किसकी गलती से *को रोना* *वायरस* एक विश्वव्यापी संकट के रूप मे उभरा ? इसकी सभी पहलुओं की समीक्षा होगी।  किसी न किसी पर , ठीकरा फोड़ा जाएगा। कोई न कोई विलेन बनकर उभरेगा। किसी न किसी की तो विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगेगा। पर, यह तो आने वाले वक्त की बात है।  फिलहाल तो वक्त है लाॅक डाऊन के नियमों का शिद्दत से पालन करने का। अपने आप को बचाने का। अपने आसपास और परिवार के अन्य सदस्यों को बचाने का। साथ ही साथ इस विश्वव्यापी संकट से जूझ रहे अपने देश को बचाने का।
.......

लेखक का नाम - मनीश वर्मा
लेखक का ईमेल- itomanish@gmail.com
प्रतिक्रिया हेतु ब्लॉग का ईमेल - editorbejodindia@g